नमस्कार, आप काफ़ी दिनों बाद आप लोगों से अपने दिल की बात करने का मौका मिला है, मन में एक डर है, की शायद आप सभी नाराज होंगे, क्योंकि इतने दिनों से गायब जो था। पर फ़िर याद आया कुछ ऐसा लिखूं जिससे आपकी नाराजगी कुछ हद तक कम हो सके। पर आगे की सभी कहानी आप मेरे नया ब्लॉग पर पढ़े,
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ध्यन्बाद.....
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मंगलवार, ८ सितम्बर २००९
शनिवार, ३ जनवरी २००९
योग-रोग-संयोग

आज काफी व्यस्त समय के बाद सोचा ब्लॉग लिखूं पर मन में एक डर था की शायद आप सभी नाराज होंगे, क्योंकि इतने दिनों से गायब जो था। पर फ़िर याद आया कुछ ऐसा लिखूं जिससे आपकी नाराजगी कुछ हद तक कम हो सके।
तो आपको बताऊँ कुछ देर पहले स्टार १ टीवी पर एक कमेडी शो देख रहा था पहचान कौन? जिसमे एक कॉमेडियन ने योग गुरु बाबा रामदेव की मिमिकरी कर रहा था , बाबा आया है योग का चमत्कार लाया है। इसी से याद आया मुझे कुछ रोचक कहानी जो एस प्रकार है ....
दरअसल मैं बस से सफर कर रहा था और मैं जिस बस में बैठा, उसमें कुछ भीड़ तो थी, लेकिन बहुत अधिक नहीं थी। फिर भी मुझे बैठने के लिए सीट नहीं मिली, लेकिन इस बात की आशा थी कि अगले किसी स्टॉपेज पर जब कुछ लोग उतरेंगे तो मिल जायेगी। मगर हुआ उसके विपरीत। अगले स्टॉपेज पर जब बस रुकी तो उतरा तो कोई नहीं, लेकिन बस में चढ़ने वाली भीड़ बहुत अधिक थी। पता चला कि वहाँ कोई योग-शिविर चल रहा था, जिसका समापन हुआ है और उसी की यह भीड़ है।
बस में अब लोग इतने अधिक हो गये थे कि सब एक-दूसरे से सटकर खड़े थे। इधर-उधर हिलने-डुलने के लिए भी कहीं कोई गुंजाइश नहीं थी। काफी लोग दरवाजे से भी लटक रहे थे। कुछ लोग बाहर भी रह गये थे। किसी तरह बस रवाना हुई। थोड़ी देर बाद लगा कि जैसे मुझे कोई खतरा नहीं था, फिर भी मन को बुरा तो लगा ही। पीठ पर धक्के का वह दबाव थोड़ी देर रहा, फिर शांत हो गया। मैंने राहत की सांस ली।
लेकिन कुछ ही क्षणों बाद फिर धक्का-सा लगा। मैंने गर्दन घुमाकर पीछे की तरफ देखा। एक मोटे तोंदियल महाशय खड़े हुए थे। वे तेजी से सांस ले रहे थे और कुछ रुककर उसे वापस निकाल रहे थे। उनकी तोंद की यह हरकत मेरे दुबले-पतले शरीर पर धक्के जैसी लग रही थी। मुझे अपनी तरफ देखते हुए पाकर वे बोले, ``माफ करना, अभी-अभी योग शिविर से आया हूँ। सो सोचा कि इस खाली समय में प्राणायाम का कुछ अभ्यास कर लूं।''
थोड़ी देर बाद दूसरी तरफ से शेर की हल्की दहाड़ की-सी आवाज आयी। मैं घबराया। बस जिस सड़क पर जा रही थी, उसमें चारों तरफ बस्तियाँ नजर आ रही थीं। तब यहाँ शेर कैसे? बस में तो इतनी भीड़ में शेर का प्रश>> ही नहीं था। कुछ ही देर बाद वैसी आवाज फिर आ गयी। इस बार मैंने उधर घूमकर देखा, जिधर से आवाज आयी थी। एक सज्जन जोर से भरपूर सांस लेते और फिर शेर जैसी तेज आवाज के साथ उसे मुंह से बाहर निकाल देते। मुझे आश्चर्य हुआ। यह देखकर मेरे पास खड़े एक सज्जन ने कहा, ``लगता है, आपको योग के बारे में कोई ज्ञान नहीं है।'' उनकी बात का समर्थन मेरे नाम का अपमान होगा और विरोध करना वास्तविकता के विरुद्ध इसलिए मैंने खामोश रहना ही बेहतर समझा। तब वे ही मेरे अज्ञान पर तरस खाते हुए बोले, ``वे भी योगाभ्यास कर रहे हैं, खाली समय का सदुपयोग कर रहे हैं।''
अचानक ही मेरे निकट भिनभिनाहट की-सी आवाज आयी। लगा जैसे कोई भ्रमर अपनी धुन में मस्त होकर भ्रमर-गीत सुना रहा हो। मैंने देखा तो मेरे निकट खड़े एक सज्जन ने अपने दोनों हाथों से अपनी आँखें और कान बंद किये हुए थे। वे नाक से लंबी श्वांस लेकर नाक से ही अजीब-सी आवाज के साथ उस श्वांस को बाहर निकाल रहे थे। मुझे लगा, जैसे उन्हें कोई शारीरिक कष्ट है। उनके कान बंद होने से उनसे कुछ पूछना तो बेकार था। इसलिए मैंने उन्हें झिंझोड़ा तो उन्होंने आँखें भी खोल दीं और कान भी। तनिक क्रोध करते हुए बोले, ``क्या बात है? क्यों डिस्टर्ब कर रहे हो?'' मैंने उन्हें शांत करते हुए कहा, ``बात तो कुछ नहीं है। आप जो इस तरह की हरकत कर रहे हैं, उससे मुझे लगा कि शायद आपका स्वास्थ्य...?''
``मेरा स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है। आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। मैं आपकी तरह समय नष्ट नहीं करता। इसीलिए इस समय में `भ्रमरी' योगाभ्यास कर रहा हूँ। समझे।'' इसके बाद उन्होंने अपनी वही हरकत पुन प्रारंभ कर दी।
इस समय तक बाहर बरसात होने लगी थी और उसने शीघ्र ही तेज गति पकड़ ली। बरसात से बचने के लिए यात्रियों ने अपनी-अपनी तरफ की खिड़कियाँ बंद कर लीं। इस बार मेरे करीब ही सीट पर बैठे एक सज्जन ने बरसात की तरफ बड़ी चिंता से देखा। फिर अपनी घड़ी देखी। इसके बाद उन्होंने अपने दोनों हाथों के पंजे खोलकर बरसात की तरफ इस तरह कर दिये, जैसे वे उसे आशीर्वाद दे रहे हों।
सीट पर बैठे होने से यह तो स्पष्ट था ही कि वे योग-शिविर से लौटे हुए लोगों में नहीं थे। फिर वे क्या कर रहे थे, यह समझ में नहीं आया। पिछले अनुभवों से मन में डर भी बैठा हुआ था कि कहीं वे भी मुझे अनाड़ी और अज्ञानी न समझ लें। सो, झिझकते हुए उन्हीं से पूछ लिया, ``आप भी क्या किसी योग की मुद्रा कर रहे हैं?'' उन सज्जन के हाथ तो यथावत रहे। बोले, ``नहीं, यह योग की बहन रेकी है। मेरा स्टॉपेज आने वाला है। इस बरसात में उतर कर
घर कैसे पहुँचूँगा? सो रेकी द्वारा बरसात को रोकने की कोशिश कर रहा हूँ।'' मैं आश्चर्यचकित रह गया।
चलिए ये कहानी तो एक बहाना था दरअसल मुझे आपकी नाराजगी से बचना था, तो जरा ये जरूर बताइए क्या आपकी नाराजगी कम हुयी?
शनिवार, ६ दिसम्बर २००८
फेरों पर कन्या

यूँ तो फेरों पर कन्या होती ही है जो अग्नि के फेरे लेती है। परंतु मैं जिस कन्या का ज़िक्र कर रहा हूँ वह फेरे लेने वाली कन्या से भिन्न है। अभी हाल ही में मेरे एक परिचित की शादी में यह कन्या मुझे दिख गई। वह मंडप में बैठी थी। सजी-संवरी, माथे पर चंदन का टीका लगाए। वह अपने पिता के बगल में बैठी थी। उसके चेहरे पर अगाध विश्वास झलक रहा था। उसके पिता फेरों की रस्म पूरी करवाते समय मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे। बीच-बीच में वे अपनी बिटिया की ओर भी झांक कर देख लेते थे। जब कभी वे पंडित जी अपनी लम्बी-सी श्वांस के साथ श्लोक को बीच में छोड़ते तो वह छोटी-सी कन्या उस श्लोक को पूरी तन्मयता से पूरा कर देती।
अलबत्ता वह सारे श्लोक अपने पिता के साथ-साथ बोल रही थी। मुझे अच्छा लगा कि किसी ने पंडिताई कर्म में अपनी बिटिया को लाने की सोची तो सही। फेरों की समाप्ति पर मैंने कोशिश करके उन पंडित जी से बात की। वे बोले- लड़का तो मेरा निकम्मा है, पढ़ता है ना लिखता है। पर ये लड़की बहुत तेज है। एक-दो बार सुनने मात्र से ही इसको सैकड़ों श्लोक कंठस्थ हो गए हैं। पंडिताई हमारा पुश्तैनी काम है। लड़के पर तो बस नहीं चलता, चलो ये कन्या ही इस काम को सीख ले। इसलिए इसे हर अवसर पर साथ ले जाता हूँ। मुझे खुशी हुई कि जिस कर्म में महिलाओं का कदम रखना एक तरह से वर्जित था, वहाँ आज उनके कदमों के निशान बनने लगे हैं। और इसमें बुरा भी क्या है? बुरा तो यह था कि आज तक उसे इस काम के लिए प्रेरित ही नहीं किया गया और न ही अवसर दिया गया।
कारण संकीर्णता और लड़की के प्रति दोयम दर्जे की भावना के और कुछ नहीं हो सकता। जब लड़कियाँ - औरतें बारात में जाने लग गई हैं तो विवाहादि मौकों पर यदि लड़कियाँ पंडिताई कर्म में भी लग जाएँ तो बढ़िया ही है। पर कुछ काम आज भी ऐसे हैं जिनमें लड़कियाँ ना के बराबर हैं। इनमें से शादी-ब्याह के मौकों पर की जाने वाली फोटोग्राफी भी एक ऐसा ही क्षेत्र है जहाँ मेरे जानकारी में अभी तक लड़कियों ने दस्तक नहीं दी है। जबकि विवाह के समय खींची जाने वाली फोटो उतारने वाली कोई लड़की ही हो, तो दुल्हन को कितनी आसानी हो जाएगी। कई बार जब फोटोग्राफर नवविवाहिता की ढोड़ी पर हाथ लगा-लगा कर पोज बनवाता है तो दुल्हन बुरी तरह शर्मा रही होती है। मेरे हिसाब से वह दिन भी आएगा जब शादी के बैंड में भी आपको लड़कियों की भागीदारी मिलेगी। कौन-सा ऐसा सुर या साज है जिसे वे नहीं जानतीं? और अगर नहीं जानतीं तो उन्हें सिखाने की पहल होनी चाहिए।
शनिवार, ८ नवम्बर २००८
ऐ जी, चमचा बन जाओ न!

ब्लॉग से इतने दिनों तक गायब रहने के लिए आप सभी से माफ़ी चाहूँगा, और माफ़ी चाहूँगा अपना वादा कंडक्टर भाई बस....पार्ट -2 नहीं लिख पाने का कारन। दरअसल मैं ४ साल बाद अपने गाँव दरभंगा गया था। धीरे- धीरे मैं आपको अपनी दरभंगा यात्रा के बारे में भी बताता रहूँगा। और ये भी वादा करता हूँ की अपने आगे की पोस्ट में कंडक्टर भाई बस.... पार्ट -२ भी जरूर लिखूंगा। पर यहाँ मैं आपको अपने और स्वेता के बिच हुए लड़ाई के बारे में बताना चाहता हूँ। स्वेता के बारे में जैसा की आपको भूतनाथ जी ने पहले ही बताया था। फ़िर भी आप जयादा जानकारी के लिए bhootmahal.blogspot.com पर भूतनाथ पहुंचा भावेश झा की गर्ल-फ्रेंड की बर्थ-डे पार्टी में ! वाली पोस्ट जरूर पढ़ लीजिये।
एक दिन हम दोनों एक साथ बैठे हुए थे । अचानक उसने मुझसे पूछी भवेश ये चमचा क्या होता है? और इसी सबाल से शुरू हो गया हमारे बिच लड़ाई।
हम उनके अल्टीमेटम से पूरी तरह बेफिक्र थे। मगर शाम ढलते-ढलते वे अंधेरे में मच्छरों की शरणस्थली वाले कक्ष में कैकेयी की तरह कोप धारण किये बैठ गई। मनाने के सभी सामान्य प्रयास विफल हो रहे थे और हम दशरथ की भांति असहाय सोच नहीं पा रहे थे पत्रकार बने रहें या फिर बन जायें चमचा।'' स्वेता को शायद नहीं मालूम चमचे क्या होते हैं। अच्छी-खासी पढ़ी-लिखी और पेशे से डॉक्टर है। इसीलिए हर चीज जानने की जिज्ग्यासा रहती है उसे। इसी का नतीजा था की मुझसे रसोई में काम आने वाले चम्मच और इसके समानार्थी चमचा में अंतर पूछ बैठी । काश! वह हमसे पूछती तो हम उसे इस तरह समझाते, ``प्रिये , जैसे खाना पकाने और परोसने के दौर में बर्तनों के साथ चम्मच का महत्व होता है, ठीक उसी तरह राजनीति में लाभ हथियाने के दौर में नेताओं के साथ चमचों का महत्व होता है।
'' बात चल रही थी, चमचे के महत्व की। एक दिन हम बड़े अच्छे मूड में थे। वैसे हम अक्सर अच्छे मूड में नहीं होते हैं।
हमारा मूड भांपकर वह बोल उठी भवेश !'' हमने कहा, ``खुलकर कहो। आज हम तुम्हारी सब बातें सुनेंगे।''
``आप भी चमचा क्यों नहीं बन जाते?''
``क्या कह रही हो, हम अच्छे-भले इज्जतदार पत्रकार है। हमें चमचा बनने को कह रही हो, कहीं आज तुम्हारा मूड तो खराब नहीं है?'' हमने कहा,
``वैसे भी उनका मूड अक्सर अनुकूल रहता है, वरना दोनों की प्रेम गाड़ी कब की पटरी छोड़ चुकी होती।''
``तो क्या हुआ, अगर बन भी जाओ?'' स्वेता ने कहा।
``पागल तो नहीं हो गई?'' हमने कहा।
``पागल नहीं हुई हूँ, समझा रही हूँ।'' स्वेता ने कहा।
``क्या यही समझा रही हो?'' बीच में ही हमारी जुबान को अपनी चहकती धारदार जुबान से काटती हुई बोली,
``नहीं जी... वो आपका दोस्त रामलाल है न, जब से किसी पार्टी के नेता का चमचा बना है, उसके घर में बड़ी-बड़ी सुख-सुविधाओं की चीजें बरसात की तरह टपक रही हैं। एक तुम हो कि समझते ही नहीं। पत्रकार हो तो वक्त की भी बारीकियों को समझो, फायदा उठाओ ।
''उनके समझाने का अंदाज देखकर हमें हमारे पत्रकारिये गुण पर शक होने लगा। फिर भी खुद को संभालते हुए हमने कहा, ``पगली! जानती हो चमचा किसे कहते हैं? नेताओं को मस्का-पॉलिश करने वाला, वक्त आने पर उनके चरण धोकर पीने वाला, और तो और उनकी चरण पादुका की पूजा करने वाला।''
``तो क्या हुआ?'' स्वेता ने एक टूक शब्दों में कहा। ``तुम्हीं बताओ, पत्रकार होकर मैं क्या ऐसा कर सकता हॅँ?'' हमने कहा, ``लोग जो मुझे नमस्कार करते हैं, कल मुझे उनके चरण छूने पड़ेंगे।''
``वे अगर तुम्हारे चरण छू रहे हैं तो कुछ आर्थिक लाभ हो रहा है? लोगों को तुम पर तरस आता है, तो एकाध कप चाय पिला देते हैं और तुम मारे खुशी के कुप्पा हो जाते हो, मानो रसगुल्ले के साथ सारी चाशनी तुम्हें ही पिला दिये हों।
'' स्वेता ने हम पर व्यंग्य मुद्रा में कहा।
``नहीं भाई! मैं ऐसा काम नहीं कर सकता। समाज में मेरी इज्जत है।''
उसने हमारी बात फिर काटी और किसी आक्रोशित शेरनी की तरह फुर्ती दिखाती हुई बोली,
``अपनी इज्जत का अचार डालोगे। तुम्हारे पास न जाने किस जमाने की मोटरसाइकिल है। स्टार्ट होने के बाद पूरे मुहल्ले को खबर लग जाती है कि पत्रकार जी अब कहीं जाने वाले हैं, और वह तुम्हारे टी।वी।, कूलर बिना ठोके -पीटे अपनी असली औकात पर नहीं आते हैं।'' अपनी भड़ास निकालने के बाद वह कुछ नॉर्मल हुई। क्योंकि हम आज ज्यादातर सुन रहे थे।
कुछ देर बाद वह बोली, ``मैंने कुछ ज्यादा कह दिया ना।'' फिर भी मैं चुप रहा। जान रहा हूँ कि अगर कुछ बोला तो अगला युद्ध किसी घाटी का हो सकता है।
``अच्छा जी छोड़ो। सब बातें मेरी मान लो और कल ही चमचा बन जाओ। भला इसी में है।'' वे पुन समझाने लगीं। ``वरना।'' अबकी बोलना ही पड़ा। ``कल तक अगर तुम नहीं बने तो फिर देखना। मैं क्या करती हूँ।
''उनकी बातों में आक्रोश भरी चेतावनी थी। कल भी आया। हम उनके अल्टीमेटम से पूरी तरह बेफिक्र थे। मगर शाम ढलते-ढलते वे अंधेरे में मच्छरों की शरणस्थली वाले कक्ष में कैकेयी की तरह कोप धारण किये बैठ गई। मनाने के सभी सामान्य प्रयास विफल हो रहे थे और हम दशरथ की भांति असहाय सोच नहीं पा रहे थे ``पत्रकार बने रहें या फिर बन जायें चमचा? क्योंकि स्वेता अपनी जिद्द पर अभी तक कायम है। चलिए आप से पूछते है, मुझे क्या करना चाहिए?
गुरुवार, २३ अक्तूबर २००८
कंडक्टर भाई बस....

चलिए एक नई कहानी नई जोश के साथ सुन लीजिये। दरअसल दिल्ली में करीब ३साल से हूँ। अब इतने दिनों से यहाँ पर हूँ तो डीटीसी और ब्लू लाइन के बस में सफर करना ही पड़ता है। एक दिन इनके स्टाफ के बारे में सोचने लगा। इनके ड्राइवर-कंडक्टर भी अनोखे जीव होते हैं। उनकी अपनी एक क्लास होती है। एक अलग दुनिया होती है, जिस पर वे राज करते हैं। उनके सामने अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाती है। फ़िर मैंने सोचा उनके लाइफ के ऊपर कुछ लिखा जाए। फ़िर मैंने ड्राइवर-कंडक्टर से जुड़े हास्यपूर्ण किस्सों का संकलन करना शुरू कर दिया ।
इसी बिच कुछ दिन पहले बस में सफर करते हुए जी में आया कि क्यों ना ड्राइवर-कंडक्टर का इंटरव्यू कर लिया जाए। जब कंडक्टर बस की सारी सवारियों की टिकट काटने के बाद मेरे पास की सीट पर आया तो मैंने कहा, `आपका इंटरव्यू लेना है।' कंडक्टर बोला, क्या लोगे? `म्हारे पास देण नैं टिकट के सिवाय और के रख्या है?' मैंने उसे सहज करते हुए कहा, मैं एक जर्नलिस्ट हूँ और `एक किताब लिख रहा हूँ , उसमें आपका इंटरव्यू भी छापना है।' कंडक्टर बोला, `इब इंटरव्यू लेकै के मन्नैं डीसी लगाओगे?' `म्हारे को नहीं देना चल कल्टी मार ले। मैंने उसे शान्त करते हुए समझाया कि दो-चार सवालों के जवाब देने से तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा, और बिच में तुम्हारे लिए एक अद्धा की भी जुगाड़ करूँगा। फ़िर भी वो मानने के लिए राजी नहीं हुआ, तो बीच में ड्राइवर हल्की-सी गर्दन मोड़ कर बोला, `रै, तेरा के बिगड़ ज्यैगा, दे दियो जवाब अर ना आते हों तो मेरे कनीं सरका दियो।' फ़िर कंडक्टर बोला, चल ले लओ भाई।पर मेरा अद्धा याद रखना।
बोलो भाई के रड़क है?' मैंने पहले सवाल में उसका नाम पूछा तो वह तुनकते हुए बोला, `जी, म्हारा के नाम बाकी रह्या है? सवेरे-सवेरे हां बस में पाँच बजे अर घर पहोंचते-पहोंचते सांझ के साढ़े नौ बज ज्यै हैं। म्हारे नाम की ना बूझो।' मैंने हाँ करते हुए नाम बताने के लिये फिर कहा तो बोला, `जी, अपणा नाम सुने होय तो मुद्दत होगी, सारे दिन कान मैं एक्के नाम पड़ै है-भाई। यूं समझ ल्यो कि मेरा नाम भाई है।' ड्राइवर ने ठहाका लगाते हुये जोड़ा, ठीक कह रह्या है। यो सारी दुनिया इस तैं भाई कहवै है- भाई टिकट काटिये, भाई सीट दुवाइये, भाई बस नैं रुकवाइये अर बेरा नीं और के के।
'मैंने दूसरा सवाल पूछा कि `तुम्हें इतना गुस्सा क्यूं आता है? तो कंडक्टर बोला, `जी, म्हारा पब्लिक डीलिंग का काम है। सवेरे तैं लेकै सांझ तक हजार आदमियां गैल पाला पड़ै है। जवाब दे-दे के सिर चकरा ज्यै है अर ऊप्पर तैं टिकट का बंडल अर यो झोला पकड़े-पकड़े हाथ ऐंठ ज्यै हैं।'
मैंने पूछा, `आपको सवारियों से सबसे ज्यादा क्या शिकायत है?' तो उसका जवाब था, `हम सबको सीट दिलवाते हैं पर कोय सी सवारी तैं मसकोड़ा मारण की कह द्यो तो यूं लखावैगी जणूं जान मांग ली हो। अर और बड़ा साक्का खुल्ले पीसां का है। किसी की अठन्नी कम रह ज्यै तो सवारी यूं समझैगी जणूं लाखां का गबन कर दिया हो।'
मैंने कहा कि `तुम सवारियों से बदतमीजी से भी तो बोलते हो', तो कंडक्टर ने स्थिति को संभालते हुए कहा, `! आप भी कमाल बात करते हो जी। इब सवारियां तैं तमीज तैं पेश आवांगे तो टिकट काटण में ए सांझ हो लेगी। अनपढ़ की तो बात नीं कर रह्य, आच्छे पढ़े-लिखे भी पूछैंगे-अब बस कित ज्यैगी, कद पहोंचैगी? बस पै क्लीयर लिख राख्या होगा कित जागी तो भी पूछ के मात्था ज़रूर खराब करैंगे। इब आप बताओ, बस का बेरा है कद पहोंचैगी, या बेरा नीं रुक के खड़ी हो ज्यै, रामजी अर बस का के भरोसा, कद के कर दे।
फ़िर क्या था। मैं अपना इंटरव्यू खतम करके उठने लगा। फ़िर उसको याद आया की मैंने टिकट नहीं लिया था। तो उसने याद दिलाया भाई तुने टिकट क्यों नै ली। फ़िर मैंने टिकट लेने की उसे पैसे दिए तो उसने मना कर दिया पर याद दिलाया की म्हारा अद्धा जरूर मिल जाना चाहिए। फ़िर उसने ज्यै रामजी कहकर बस को आगे की और बढ़ा लिया।
उस टाइम तो वह चला गया और मेरा काम कर गया। पर अगले अंक में पढिये जब वो मुझे दुबारा मिला और उसे उसका अद्द्धा नहीं मिला तो उसने मेरे साथ क्या किया।
बुधवार, १५ अक्तूबर २००८
बांग्लादेशी घुसपैठिए -- भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ

राष्ट्र की अपनी ही समस्याएँ कम नहीं हैं। सुरसा के मुँह की तरह आम आदमी को डंसती महंगाई, देश की कानून-व्यवस्था को धता बताते हुए स्थान-स्थान पर आतंकी विस्फोट, क्षेत्रवाद की राजनीति के चलते पूर्वोत्तर प्रान्तों व महाराष्ट्र में देश के नागरिकों के साथ किया जा रहा दुर्व्यवहार, कृषि क्षेत्रों में कम उपज व अकाल के कारण आत्महत्या हेतु विवश किसान सहित अनेक ऐसी समस्याएँ हैं, जिनसे राष्ट्र जूझ रहा है। इन समस्याओं के चलते राष्ट्र की समृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, ऐसे में विदेशी घुसपैठियों की देश में उपस्थिति देश की अर्थव्यवस्था एवं कानून-व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालने में पीछे नहीं है।
कहना गलत न होगा कि संकीर्ण स्वार्थों के चलते राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की अवधारणा को तिल-तिल खंडित करने का कुचक्र जारी है, यदि ऐसा न होता तो बांग्लादेशी घुसपैठियों को सरलता से देश में आश्रय नहीं मिल पाता। आज स्थिति यह है कि देश के कुछ शहरों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की अलग बस्तियाँ हैं।
कुछेक घुसपैठियों को नागरिकता प्रदान करके खुलकर खेलने का अवसर प्रदान कर दिया गया है। धरपकड़ जैसी कोई स्थिति नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप देश के विभिन्न भागों में बांग्लादेशी घुसपैठिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ बनते जा रहे हैं। उन्हें देश से निकालने के लिए कारगर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। यही स्थिति अन्य घुसपैठियों की भी है। देश की मिली-जुली संस्कृति का लाभ उठाकर घुसपैठिए भारतीय जनमानस में इतने अधिक घुल-मिल गए हैं कि उनकी पहचान करना भी टेढ़ी खीर हो गया है।
देश निर्धारित सीमाओं में बसे नागरिकों को सुख-सुविधाएँ देने हेतु बाध्य हैं। नीतियाँ भी राष्ट्र के नागरिकों के सर्वांगीण विकास को दृष्टिगत करते हुए बनाई जाती हैं किन्तु निर्धारित एवं वास्तविक नागरिकों से इतर विदेशी घुसपैठिए यदि भारतीय जनमानस में घुसपैठ करेंगे तो अतिरिक्त जनसंख्या का दबाव क्या भारतीय अर्थव्यवस्था को पंगु नहीं करेगा? भारतीय कानून-व्यवस्था को चुनौती देते घुसपैठियों की स्थिति से यह प्रशन स्वयं स्फुटित है। निसंदेह यदि बांग्लादेशी घुसपैठियों सहित अन्य विदेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें देश से नहीं खदेड़ा गया तो राष्ट्र को अपनी अस्मिता की पहचान बनाने के लिए जूझना पड़ सकता है, क्योंकि जो इस देश के नागरिक नहीं हैं, उन्हें राष्ट्रीय अस्मिता एवं गौरव से भला क्यों कर कोई सरोकार होगा?
शनिवार, ११ अक्तूबर २००८
बिसलेरी और प्रेमी

हाल ही में मुझे कुतुब मीनार देखने का मौका मिला। देखनी तो पहले चाहिए थी, पर संयोग ही नहीं बना। मीनार की खूबसूरती की सराहना किये बिना कौन रह सकता है? मेरा मन भी उसे निहार कर मुग्ध होता रहा। सचमुच यह मीनार हमारी वास्तुकला का गज़ब का सबूत है। पर वहाँ जाकर आपके मन में एक खीझ-सी मचती है। या हो सकता है कि मुझे ही हो रही हो। हर कोने में आपको पानी की खाली बोतलें पसरी मिलेंगी जिन्हें आम आदमी बिसलेरी के नाम से जानता है। आम आदमी तो ब्रांड को ही वस्तु बना देता है। उसके लिये पानी की हर बोतल बिसलेरी की बोतल है, भले ही ब्रांड कोई भी हो।
ठीक वैसे ही जैसे स्कूल-कॉलेज के साधारण बच्चे हर गाइड को एमबीडी कहते हैं। मैंने किताबों की एक दुकान पर एक विद्यार्थी को कहते सुना कि दीपक की एमबीडी दे दो। यानी वह दीपक गाइड मांग रहा था। उन खाली बोतलों को देख कर यही लगता रहा कि हमने सिर्प प्यास बुझाना सीखा है, पर खाली बोतल फेंकना नहीं सीखा। अब पता नहीं हमें खाली बोतल फेंकना कौन सिखायेगा? पर यह किसने सिखाया है कि बोतलों को जहाँ मर्जी वहाँ फेंक दो। फिर ख्याल आया कि बोतल भरने वाले भी कमाल के हैं। नलों में पानी नहीं आ रहा। जगह-जगह पानी के लिये त्राहि-त्राहि मची है, तो फिर ये बोतलों वाले पानी कहाँ से भरते हैं? जी करता है कि इनके कुएं या नहर को देख कर आऊं और आम आदमी को उसका पता बता दूं। कुतुब मीनार पर जाकर यदि आप कोशिश करके इन बोतलों से ध्यान हटा भी लें तो आपका ध्यान इधर-उधर बैठे प्रेमियों पर जाए बगैर नहीं रह सकता जो अपनी प्रेमिका का हाथ पकड़े बैठे रहते हैं। उनकी चुहलबाजियां आपको चैन से मीनार देखने नहीं देतीं।
और अगर आप इन प्रेमी जोड़ों से बच भी जाएं तो वहाँ की दीवारों पर खुदे हुए प्रेमियों के नाम आपके आनंद को खंडित करते हैं। खुरच-खुरच कर सभी कोनों-दीवारों पर प्रेमियों ने अपने और अपनी प्रेयसियों के नाम अमर करने की दृष्टि से वहाँ अंकित कर रखे हैं। मेरे ख्याल से जिस तरह इंडिया गेट पर वर्ल्ड वार में शहीद होने वालों के नाम अंकित किया गया है, उसी तरह कोई दीवार, दरवाजा या किला बना दिया जाए जहाँ प्रेमी जोड़े बेफिक्र होकर अपने नाम खोद सकें ताकि हमारी ऐतिसिक इमारतों को तो कोई छलनी ना कर सके।
एक बार की बात है कि गांव में नत्थू अपने दादे की गोद में बैठा था। नत्थू क्या था, बस यूं समझो कि जैसे कोई बबुआ बैठा हो। गोरा रंग अर गुलाबी ओंठ वाला सुथरा-सा बालक। छोरा अपने दादे के चेहरे की झुर्रियां अर टूटे दांत देख कर बोल्या, `दादा! यूं बता कि तुम्हें भी रामजी ने ही बनाया था क्या?' दादा बोल्या, `हाँ बेटा! आज से बयासी साल पहले रामजी ने ही मुझे बनाया था।' फिर नत्थू बोल्या, `अर मैं भी रामजी ने ही बनाया हुआ हूँ क्या?' दादा बोल्या, `हाँ बेटा, तुझे भी छ साल पहले रामजी ने ही बनाया था।' नत्थू फिर बोल्या, `दादा, ये बात तो माननी पड़ेगी कि पहले के मुकाबले माणस तो रामजी आजकल सुथरे बनाने लग्या है।'
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